EXCLUSIVE: नीमकाथाना के सियासी वादों का चक्रव्यूह: प्रेम सिंह बाजोर और सुरेश मोदी के दावों के बीच फंसी जनता और अधूरे विकास की दास्तान

नीमकाथाना के राजनीतिक परिदृश्य, जिला गठन की जमीनी हकीकत, कुंभाराम लिफ्ट पेयजल परियोजना और प्रेम सिंह बाजोर व सुरेश मोदी के अधूरे वादों पर एक विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण।

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अरावली की पथरीली पहाड़ियों और समृद्ध खनिज संपदा के बीच बसा नीमकाथाना क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान की राजनीति का सबसे संवेदनशील और चर्चा में रहने वाला केंद्र बना हुआ है। कभी सीकर जिले का एक कस्बा और तहसील रहा यह इलाका विकास, नए जिले की पहचान और बुनियादी ढांचे के बड़े-बड़े दावों की बिसात पर बार-बार चुनावी अखाड़ा बनता रहा है। नीमकाथाना की सियासत मुख्यतः दो कद्दावर चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती आई है—एक तरफ कांग्रेस के विधायक सुरेश मोदी, जिन्होंने पिछले कार्यकाल में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता व सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष प्रेम सिंह बाजोर। चुनावों के दौरान दोनों ही नेताओं ने जनता के सामने विकास के सुनहरे सपने बुने, मंचों से ऐतिहासिक घोषणाएं कीं और खुद को इलाके की तकदीर बदलने वाला मसीहा साबित करने की होड़ लगाई। हालांकि,चुनावी बयार थमने के बाद जब जमीनी हकीकत का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाता है, तो नीमकाथाना की आम जनता खुद को सियासी वादों और राजनीतिक नफा-नुकसान के बीच उपेक्षित पाती है।

नए जिले का दर्जा: प्रशासनिक उपलब्धि या अधूरा राजनीतिक हथकंडा?

नीमकाथाना के इतिहास में सबसे बड़ा चुनावी और राजनीतिक मुद्दा इसे नए जिले का दर्जा दिलाना रहा। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में विधायक रहे सुरेश मोदी ने नीमकाथाना को नया जिला घोषित करवाने का पूरा श्रेय लिया और 2023 के विधानसभा चुनाव में इसे अपने सबसे बड़े चुनावी ट्रंप कार्ड के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने दावा किया था कि जिला बनने के बाद नीमकाथाना की प्रशासनिक व्यवस्था बदल जाएगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा और इलाके का कायाकल्प हो जाएगा।

लेकिन इस घोषणा के पीछे की प्रशासनिक और ढांचागत तैयारी को लेकर आज भी गंभीर सवाल खड़े हैं। जिला घोषित हुए लंबा अरसा बीत जाने के बावजूद नीमकाथाना में मिनी सचिवालय, आधुनिक जिला कलेक्ट्रेट परिसर, पूर्णकालिक जिला स्तरीय कार्यालय और आवश्यक तकनीकी स्टाफ की भारी कमी बनी रही। कई महत्वपूर्ण विभाग पुराने और जर्जर भवनों में संचालित होते रहे या फिर उनके कामकाज के लिए स्थानीय नागरिकों को पहले की तरह सीकर या जयपुर के चक्कर काटने पड़े। केवल एक अधिसूचना जारी करवाकर श्रेय की राजनीति करने के चक्कर में बुनियादी प्रशासनिक ढांचा खड़ा नहीं किया गया, जिससे आमजन को जिला बनने का वास्तविक लाभ उस गति से नहीं मिला जिसका वादा किया गया था।

वहीं दूसरी ओर, राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता प्रेम सिंह बाजोर और उनकी पार्टी की भूमिका भी जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी। जब राजस्थान में भाजपा सरकार के गठन के बाद नए जिलों की समीक्षा के लिए कैबिनेट उप-समिति बनाई गई और नीमकाथाना के जिले के अस्तित्व पर ही संशय के बादल मंडराने लगे, तो क्षेत्र की जनता में भारी रोष फैल गया। बाजोर ने चुनावों के दौरान क्षेत्र के समग्र विकास और सत्ता में आने पर विकास को दोगुनी गति देने के वादे किए थे, लेकिन जब जिले के प्रशासनिक वजूद और बजट आवंटन की बात आई, तो भाजपा का स्थानीय नेतृत्व सरकार से पर्याप्त बजट और स्थाई जिला इन्फ्रास्ट्रक्चर की मंजूरी दिलाने के लिए उस आक्रामकता के साथ खड़ा नहीं दिखा, जिसकी जनता अपेक्षा कर रही थी।

कुंभाराम लिफ्ट कैनाल: दशकों पुरानी प्यास और कागजी शिलान्यास

नीमकाथाना और समूचे शेखावाटी अंचल की सबसे विकट समस्या गिरता भूजल स्तर और पीने के मीठे पानी का अभाव है। वर्षों से हर चुनाव में यमुना जल समझौते और कुंभाराम आर्य लिफ्ट पेयजल परियोजना के जरिए हिमालय का मीठा पानी नीमकाथाना के घर-घर तक पहुंचाने का वादा किया जाता रहा है।

सुरेश मोदी ने अपने कार्यकाल के दौरान कुंभाराम नहर परियोजना के तहत करोड़ों रुपये के बजट और पाइपलाइन बिछाने की योजनाओं के जोर-शोर से प्रचार किए। चुनावी सभाओं में इसे अपनी सबसे बड़ी जीत बताया गया, लेकिन धरातल पर योजना की कछुआ चाल ने जनता को निराश किया। पाइपलाइन डालने के नाम पर शहर और ग्रामीण इलाकों की सड़कें महीनों तक खुदी पड़ी रहीं, जिससे धूल, दुर्घटनाएं और व्यापारिक नुकसान बढ़ा,लेकिन घरों के नलों में नियमित मीठा पानी पहुंचाने का सपना आज भी अधूरा ही रहा।

दूसरी ओर, प्रेम सिंह बाजोर ने अपनी रैलियों में ‘डबल इंजन’ सरकार का हवाला देकर पानी की समस्या को चुटकियों में हल करने और केंद्र से विशेष परियोजनाएं लाने के वादे किए थे। परंतु सत्ता संतुलन बदलने के बाद भी नीमकाथाना के कई ग्रामीण और ढाणी इलाकों में जनता को गर्मियों और सामान्य दिनों में भी निजी टैंकरों के भरोसे हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। पानी जैसे बुनियादी अधिकार को लेकर दोनों नेताओं ने केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेला, जहां एक पक्ष देरी के लिए वर्तमान सरकार को जिम्मेदार ठहराता है, तो दूसरा पक्ष पूर्ववर्ती सरकार पर अधूरी डीपीआर और वित्तीय कुप्रबंधन का ठीकरा फोड़ता है।

स्वास्थ्य और शिक्षा: कपिल अस्पताल की बदहाली और रेफरल सेंटर का ठप्पा

नीमकाथाना का राजकीय कपिल अस्पताल पूरे क्षेत्र का सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा केंद्र है। इस अस्पताल को उप-जिला स्तर से जिला अस्पताल के रूप में क्रमोन्नत करने और आधुनिक ट्रॉमा सेंटर, आईसीयू, न्यूरोलॉजी और कार्डियोलॉजी जैसी सुपर-स्पेशियलिटी सुविधाएं उपलब्ध कराने के वादे दोनों ही नेताओं के चुनावी घोषणापत्रों का प्रमुख हिस्सा रहे हैं।

हकीकत यह है कि आज भी कपिल अस्पताल गंभीर रूप से घायल या जटिल बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए केवल एक ‘रेफरल सेंटर’ बनकर रह गया है। अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों, सर्जनों और एनेस्थेटिस्ट्स की भारी कमी है। आधुनिक सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी सुविधाओं के लिए मरीजों को जयपुर या सीकर भागना पड़ता है। हाल ही में शहर में बिजली कटौती और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की जो खबरें आती हैं, उसका असर सीधे स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। न तो पूर्व विधायक अपने कार्यकाल में पर्याप्त मेडिकल फैकल्टी की स्थाई व्यवस्था करा सके, और न ही वर्तमान में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अस्पताल की दशा सुधारने के लिए कोई ठोस प्रशासनिक दखल दे पाया।

शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़े-बड़े दावों के बावजूद नीमकाथाना में कन्या महाविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों (आईटीआई व पॉलिटेक्निक) में सीटों व आधुनिक प्रयोगशालाओं की कमी बरकरार है। छात्र राजनीति से जुड़े मुद्दों और स्थानीय युवाओं के रोजगार पर केवल भाषणबाजी हुई, लेकिन स्थानीय उद्योगों में स्थानीय युवाओं को आरक्षण या प्राथमिकता दिलाने के लिए कोई नीतिगत कदम नहीं उठाया गया।

खनन नीति, पर्यावरण विनाश और टूटी सड़कें

नीमकाथाना क्रशर जोन, पत्थर खनन और खनिज संपदा का बड़ा केंद्र है। यह क्षेत्र पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन न होने की भारी कीमत चुका रहा है।

  • अवैध खनन पर खामोशी: चुनावों के समय दोनों ही खेमों की ओर से अवैध खनन पर रोक लगाने और पर्यावरण संरक्षण के वादे किए जाते हैं,लेकिन चुनाव खत्म होते ही खनन माफिया और ट्रांसपोर्ट लॉबी के सामने राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है।

  • सड़कों का जर्जर हाल: ओवरलोडेड ट्रकों और डंपरों के कारण नीमकाथाना-खेतड़ी, नीमकाथाना-कोटपूतली और शाहपुरा मार्ग सहित ग्रामीण सड़कें आए दिन गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं। आम जनता धूल फांकने और आए दिन होने वाले जानलेवा सड़क हादसों का शिकार बनने को मजबूर है।

  • बाईपास का अधूरा सपना: शहर को भारी वाहनों के जाम से मुक्ति दिलाने के लिए रिंग रोड या मजबूत बाईपास के प्रोजेक्ट वर्षों से फाइलों में धूल फांक रहे हैं।

जनता का मोहभंग और जवाबदेही की मांग

नीमकाथाना की राजनीति का सबसे दुखद पहलू यह रहा है कि यहां विकास का पैमाना जनहित के बजाय व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। जब भी कोई नागरिक अपनी बुनियादी समस्याओं—टूटी सड़कें, बिजली कटौती, पानी का संकट या लचर कानून-व्यवस्था—को लेकर आवाज उठाता है, तो उसे राजनीतिक खेमेबाजी में बांट दिया जाता है।

प्रेम सिंह बाजोर जहां अपनी जनसेवा, दानशीलता और सत्ता के रसूख के नाम पर समर्थन मांगते रहे हैं, वहीं सुरेश मोदी अपनी सादगी और जिला बनाने के फैसले को अपनी ऐतिहासिक ढाल बनाते रहे हैं। परंतु सच्चाई यह है कि इन दोनों ही दिग्गजों ने नीमकाथाना के आम मतदाता के उस अटूट भरोसे को तोड़ा है, जो उसने चुनावी वादों पर किया था। जब तक नीमकाथाना में पानी, स्वास्थ्य, मजबूत प्रशासनिक ढांचा और साफ-सुथरा पर्यावरण धरातल पर नहीं उतरता, तब तक इन दोनों नेताओं के चुनावी दावे केवल और केवल सियासी बयानबाजी के रूप में ही याद किए जाएंगे।

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