उत्तराखंड की शांत और मनोरम वादियों में जब एक मध्यमवर्गीय परिवार की 19 वर्षीय बेटी अपने पैरों पर खड़े होने का सपना लेकर घर से निकली थी,तो किसी ने नहीं सोचा था कि देवभूमि की वह पावन माटी कुछ ही दिनों में एक जघन्य अपराध और अंतहीन अन्याय का गवाह बन जाएगी। पौड़ी गढ़वाल के श्रीकोट की रहने वाली अंकिता भंडारी केवल एक नाम नहीं है; वह इस देश की उन करोड़ों बेटियों का प्रतीक है जो आर्थिक तंगहाली के बावजूद अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करतीं। ऋषिकेश के गंगा भोगपुर स्थित वनंतरा रिजॉर्ट में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक युवती की हत्या का मामला नहीं था, बल्कि वह रसूख, पैसे और सत्ता के नशे में चूर उस वीआईपी सिंडिकेट का नंगा नाच था जो गरीबों की इज्जत को अपनी जागीर समझता है।
आज जब वर्षों बीत जाने के बाद भी अंकिता के बूढ़े मां-बाप न्याय की भीख मांगने के लिए राजधानी दिल्ली के राजघाट पर बापू की समाधि के सामने मौन व्रत रखने को मजबूर हैं, तो यह सवाल सीधे तौर पर हमारे लोकतांत्रिक ढांचे और न्यायिक व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा बनकर लगता है। जब बेटी को न्याय दिलाने निकली एक लाचार मां को पुलिस जबरन गाड़ियों में खींचती है और वह सड़क पर अचेत होकर गिर जाती है, तब यह साफ हो जाता है कि व्यवस्था पीड़ित के साथ नहीं, बल्कि सत्ता के साए में पलने वाले रसूखदारों के साथ खड़ी नजर आ रही है।
स्वाभिमान के लिए दी गई शहादत: समझौता न करने की कीमत
अंकिता भंडारी ने जो किया, वह अदम्य साहस की मिसाल था। रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी करने गई इस मासूम बच्ची पर जब तथाकथित ‘खास मेहमानों’ को अनैतिक सेवाएं देने का दबाव बनाया गया, तो उसने अपनी जान की बाजी लगा दी लेकिन अपना आत्मसम्मान नहीं खोया। उसकी व्हाट्सएप चैट के वे शब्द आज भी हर संवेदनशील नागरिक के दिल को चीरते हैं, जिनमें उसने स्पष्ट कहा था कि “मैं गरीब हो सकती हूं, लेकिन बिकने वाली नहीं हूं।”
अंकिता चाहती तो चुपचाप समझौता कर सकती थी, लेकिन उसने एक स्वाभिमानी गढ़वाली बेटी की तरह उस गंदे तंत्र को ललकारा। उसकी इस दृढ़ता का अंजाम यह हुआ कि उसे सुनसान रात में चिल्ला नहर में फेंककर मार दिया गया। यह किसी सामान्य अपराध का परिणाम नहीं था; यह उस सामंती और अहंकारी सोच का हमला था जो यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि एक साधारण परिवार की लड़की उनके अनैतिक आदेशों को ठुकरा दे। अंकिता ने अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए प्राण त्याग दिए, लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस देश ने उसे सुरक्षा देनी थी, वह आज उसके हत्यारों और उनके संरक्षकों को मुकम्मल सजा दिलाने में हांफ रहा है।
बुलडोजर से सबूत मिटाने का खेल और ‘वीआईपी’ का रहस्य
इस पूरे मामले में जांच की शुरुआत से ही जो संदेहास्पद घटनाएं घटीं, उन्होंने जनमानस में व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया:
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सबूत मिटाने की जल्दबाजी: घटना के तुरंत बाद जब पूरा राज्य आक्रोश की आग में जल रहा था, रातों-रात वनंतरा रिजॉर्ट पर बुलडोजर चलवा दिया गया। दावा किया गया कि यह ‘अवैध अतिक्रमण’ पर कार्रवाई थी, लेकिन हकीकत यह थी कि जिस कमरे में अंकिता रहती थी और जहां अपराध के सबसे पुख्ता फॉरेंसिक साक्ष्य मौजूद हो सकते थे, उसे ही सबसे पहले मलबे में तब्दील कर दिया गया। यह कार्रवाई न्याय दिलाने के लिए नहीं, बल्कि रसूखदार चेहरों के सुराग मिटाने का खुला प्रयास प्रतीत हुई।
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वह ‘वीआईपी’ कौन था?: अंकिता की चैट्स और बयानों में जिस तथाकथित ‘वीआईपी’ का बार-बार जिक्र आया, जिसके लिए अंकिता पर अनैतिक दबाव बनाया जा रहा था, उस चेहरे को आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? क्या उस वीआईपी की राजनीतिक या सामाजिक पहुंच इतनी बड़ी है कि कानून के हाथ उस तक पहुंचते-पहुंचते कांपने लगते हैं?
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पटवारी पुलिसिंग की नाकामी: घटना के शुरुआती घंटों में जिस तरह रेगुलर पुलिस के बजाय राजस्व पुलिस की सुस्ती देखने को मिली, उसने मुख्य आरोपियों को अपनी साजिश रचने और कहानी गढ़ने का पूरा वक्त दिया।
राजघाट की वो सिसकियां: क्या यही है गांधी का भारत?
हाल ही में जब अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी और मां सोनी देवी न्याय की गुहार लगाते हुए देश की राजधानी दिल्ली पहुंचे, तो उन्हें क्या मिला? महात्मा गांधी की समाधि राजघाट के सामने जब वे मौन व्रत रखकर शांतिपूर्ण ढंग से देश का ध्यान आकर्षित करने बैठे थे, तो दिल्ली पुलिस का भारी-भरकम अमला पहुंचा और उन्हें बलपूर्वक वहां से हटा दिया गया।
उस धक्का-मुक्की में एक दुखी, कमजोर और बेबस मां सड़क पर गिरकर बेहोश हो गई। अस्पताल के बेड पर ऑक्सीजन मास्क के पीछे से झांकती सोनी देवी की सूनी आंखें समूचे देश से सवाल पूछ रही हैं—“क्या अपनी मृत बेटी के लिए इंसाफ मांगना इस देश में अपराध है?”
जो व्यवस्था अपराधियों को जेल में वीआईपी सुविधाएं मुहैया कराती है, वही व्यवस्था एक पीड़िता के बुजुर्ग माता-पिता को सड़क पर घसीटती है। यह दृश्य केवल एक परिवार का अपमान नहीं था, यह उस संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन था जो हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाने की गारंटी देता है।
वीआईपी संस्कृति बनाम आम नागरिक की गरिमा
अंकिता भंडारी का मामला सीधे तौर पर उस सड़ी-गली वीआईपी संस्कृति पर प्रहार करता है, जहां सत्ता और धन के नशे में चूर लोग किसी भी कानून को अपनी जेब में समझते हैं। रिजॉर्ट्स, स्पा और पर्यटन केंद्रों की आड़ में चलने वाले इस प्रकार के अनैतिक धंधों पर प्रशासनिक आंखें क्यों मूंद ली जाती हैं? क्योंकि इनके पीछे राजनीतिक रसूखदारों के बेटे, रिश्तेदार या कारोबारी साझेदार होते हैं।
जब तक ऐसे मामलों में केवल मोहरों को जेल भेजकर मुख्य साजिशकर्ताओं और वीआईपी संरक्षकों को बचाया जाता रहेगा, तब तक किसी भी बेटी के लिए यह देश सुरक्षित नहीं हो सकता। न्याय केवल कागजों पर आरोप पत्र दाखिल करने का नाम नहीं है; न्याय तब होता है जब समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी यह महसूस करे कि उसके साथ गलत करने वाले का हश्र वही हुआ जो कानून की किताब में लिखा है।
न्याय की राह: देश की अंतरात्मा से सवाल
अंकिता भंडारी के माता-पिता आज अकेले नहीं हैं। उत्तराखंड के कोने-कोने से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में आज भी छात्र, युवा, महिलाएं और सामाजिक संगठन ‘जस्टिस फॉर अंकिता’ के नारे के साथ सड़कों पर हैं। इस लड़ाई को तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक:
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मामले से जुड़े हर एक आरोपी, चाहे उसका राजनीतिक ओहदा कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे अदालत से फांसी के तख्ते तक नहीं पहुंचाया जाता।
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उस अज्ञात ‘वीआईपी’ के नाम का सार्वजनिक खुलासा नहीं होता जिसके इशारे पर यह सारा दबाव बनाया गया था।
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सबूत मिटाने के लिए रातों-रात रिजॉर्ट पर बुलडोजर चलाने का आदेश देने वाले अधिकारियों की आपराधिक संलिप्तता की निष्पक्ष जांच नहीं होती।
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अंकिता के माता-पिता को सुरक्षा और सम्मानजनक कानूनी सहयोग सुनिश्चित नहीं कराया जाता।
देवभूमि की इस बेटी ने मरते दम तक अपने आत्मसम्मान का सौदा नहीं किया। अब यह हमारी, समाज की और पूरे देश की सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम उसकी शहादत को व्यर्थ न जाने दें। अंकिता भंडारी को न्याय दिलाना केवल एक मुकदमे को जीतना नहीं है, बल्कि यह साबित करना है कि इस देश में एक गरीब किसान की बेटी की इज्जत किसी रसूखदार की दौलत और सत्ता से कहीं अधिक कीमती है। अगर आज हम खामोश रहे, तो कल किसी और अंकिता की चीखें किसी सुनसान नहर की गहराइयों में दफन हो जाएंगी। न्याय की यह मशाल तब तक जलती रहनी चाहिए जब तक इंसाफ की सुबह नहीं हो जाती।







