कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर सनातन परंपरा का अत्यंत पावन पर्व नरक चतुर्दशी मनाया जाता है। इसे रूप चौदस, छोटी दीपावली,नरक निवारण चतुर्दशी अथवा काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली से ठीक एक दिन पहले और धनतेरस के अगले दिन पड़ने वाले इस पर्व पर मृत्यु के देवता यमराज, माता काली, भगवान श्रीकृष्ण और संकटमोचन हनुमान जी की विशेष आराधना का विधान है।
पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान (जयपुर – जोधपुर) के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, पंचांग गणना के मुताबिक चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 7 नवंबर को सुबह 10:38 बजे से हो चुकी है, जो 8 नवंबर प्रातः 11:29 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल और महानिशा में चतुर्दशी तिथि की उपस्थिति के कारण यम दीपदान, हनुमान जयंती और काली चौदस का पूजन 7 नवंबर को ही संपन्न होगा, जबकि उदयातिथि के अनुसार रूप निखारने वाला पारंपरिक ‘अभ्यंग स्नान’ 8 नवंबर की सुबह किया जाएगा।
चतुर्दशी तिथि, प्रदोष काल और दीपदान का समय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शाम के समय प्रदोष काल में यमराज के निमित्त घर के मुख्य द्वार और कोनों में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके चार मुखी दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और परिवार में आरोग्य का वास होता है। इस वर्ष तिथियों और मुहूर्तों का समय-विभाग इस प्रकार रहेगा:
उत्तर भारतीय परंपरा अनुसार हनुमान जयंती का संयोग
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा (अर्द्धरात्रि) को माता अंजनी के गर्भ से रुद्रावतार श्री हनुमान जी का प्राकट्य हुआ था। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है:
आश्चिनस्यासिते पक्षे भूतायां च महानिशि। भौमवारेऽञ्जनादेवी हनूमन्तमजीजनत्॥
7 नवंबर को चतुर्दशी तिथि निशीथकाल (अर्द्धरात्रि) में व्यापिनी है, इसलिए उत्तर भारतीय परंपरा के अनुसार श्री हनुमान जयंती का पावन पर्व इसी दिन मनाया जाएगा। (उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत में हनुमान जयंती चैत्र पूर्णिमा को मनाई जाती है)।
08 नवंबर को रूप निखारने वाला ‘अभ्यंग स्नान’
नरक चतुर्दशी को ‘रूप चौदस’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन शारीरिक सज्जा, शुद्धि और सौंदर्य निखारने की प्राचीन परंपरा है। परंपरा के अनुसार,महिलाएं व पुरुष सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में हल्दी, चंदन और सरसों का तेल मिलाकर तैयार किए गए विशेष उबटन को शरीर पर लगाते हैं और फिर स्नान करते हैं। 8 नवंबर को उदयातिथि में अभ्यंग स्नान का सबसे श्रेष्ठ समय प्रातः 05:41 बजे से 06:38 बजे तक (कुल अवधि 57 मिनट) रहेगा।
पौराणिक कथा: नरकासुर वध और राजा बलि को वरदान
इस पर्व से दो प्रमुख पौराणिक संदर्भ जुड़े हुए हैं। पहला प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा है, जिन्होंने चतुर्दशी तिथि के दिन ही माता अदिति के दिव्य कुंडल और आभूषण चुराने वाले क्रूर असुर नरकासुर का संहार किया था और उसके कारागार से 16 हजार बंदी कन्याओं को मुक्त कराकर उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाई थी।
दूसरा प्रसंग दैत्यराज बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ा है। जब राजा बलि ने 100 यज्ञ पूर्ण कर तीनों लोकों पर अधिकार करने का प्रयास किया, तब भगवान वामन ने तीन पग भूमि मांगकर कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या के बीच बलि का संपूर्ण राज्य नाप लिया था। बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने वरदान दिया कि जो व्यक्ति कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को यमराज के निमित्त दीपदान करेगा, उसे कभी यम यातना और नरक का कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा।
पूजन विधि और लोकसंस्कृति की विविधता
भारत के विभिन्न राज्यों में इस पर्व को अनूठे ढंग से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे छोटी दिवाली के रूप में दीप जलाकर और मिठाइयां बांटकर मनाते हैं। गुजरात और महाराष्ट्र में इसे काली चौदस के रूप में मनाया जाता है, जहां आसुरी शक्तियों के नाश के लिए मां काली की गुप्त पूजा होती है। दक्षिण भारत में लोग तिल के तेल से स्नान कर नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
पूजा के लिए प्रातः स्नान के उपरांत घर के ईशान कोण में यमराज, भगवान श्रीकृष्ण, मां काली, भगवान शिव, संकटमोचन हनुमान और वामन देव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। देवताओं को कुमकुम का तिलक लगाएं, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें तथा मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। शाम को प्रदोष काल में घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर यमराज के नाम का चौमुखा दीपक जलाकर परिवार की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।







