भारतीय राजनीति में परिवारवाद हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। खासकर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है। बीजेपी के नेता अक्सर कहते हैं कि कांग्रेस में एक ही परिवार का दबदबा है, वहां कार्यकर्ताओं की मेहनत और योग्यता से ज्यादा नेताओं के परिवारों को महत्व दिया जाता है। लेकिन जब यही सवाल बीजेपी के अपने नेताओं के परिवारों को लेकर उठने लगते हैं, तो पार्टी के परिवारवाद विरोधी दावों पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
राजस्थान में श्रीमाधोपुर से झाबर सिंह खर्रा के परिवार की चुनावी दावेदारी और राजेंद्र राठौड़ के बेटे तथा बहू को टिकट दिए जाने के मुद्दे ने इसी बहस को हवा दी है। एक तरफ बीजेपी कांग्रेस को परिवारवाद के नाम पर घेरती है, तो दूसरी तरफ पार्टी के अपने नेताओं के परिजनों को राजनीतिक अवसर मिलने पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में जनता पूछ रही है कि आखिर परिवारवाद का पैमाना क्या है? क्या परिवारवाद सिर्फ कांग्रेस में दिखाई देता है या बीजेपी में भी राजनीतिक परिवारों को प्राथमिकता दी जा रही है?
कांग्रेस में परिवारवाद गलत, तो बीजेपी में सही कैसे?
बीजेपी लंबे समय से खुद को ऐसी पार्टी के रूप में पेश करती रही है, जहां एक सामान्य कार्यकर्ता भी अपनी मेहनत और समर्पण के दम पर बड़े पद तक पहुंच सकता है। पार्टी का दावा रहा है कि यहां राजनीतिक विरासत से ज्यादा संगठन के प्रति निष्ठा और काम को महत्व दिया जाता है। लेकिन जब बड़े नेताओं के परिवारों को टिकट दिए जाने की चर्चा होती है, तो यह दावा सवालों के घेरे में आ जाता है।
श्रीमाधोपुर में झाबर सिंह खर्रा के परिवार के सदस्यों की चुनावी दावेदारी को लेकर चर्चा इसी सवाल को सामने लाती है। वहीं, राजेंद्र राठौड़ के बेटे और बहू को टिकट मिलने के मुद्दे पर भी राजनीतिक बहस हो रही है। इन घटनाक्रमों के बीच सवाल यह है कि क्या बीजेपी के भीतर सभी कार्यकर्ताओं को समान अवसर मिल रहे हैं या फिर बड़े नेताओं के परिवारों को राजनीतिक लाभ मिलना आसान है?
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी नेता की पत्नी, बेटा, बेटी या बहू का चुनाव लड़ना अपने आप में गलत नहीं है। लोकतंत्र में प्रत्येक योग्य नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार है। लेकिन जब कोई पार्टी परिवारवाद के खिलाफ सबसे मुखर आवाज उठाती है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपने टिकट वितरण में भी उन्हीं सिद्धांतों का पालन करे, जिनकी दुहाई वह विपक्ष को घेरने के लिए देती है।
अगर कांग्रेस के किसी नेता के बेटे को टिकट मिलने पर बीजेपी सवाल उठाती है, तो बीजेपी के किसी नेता के परिजन को टिकट मिलने पर भी सवाल पूछे जा सकते हैं। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है और यही राजनीतिक जवाबदेही का आधार भी है।
झाबर सिंह खर्रा के परिवार की दावेदारी ने बढ़ाई चर्चा
श्रीमाधोपुर में झाबर सिंह खर्रा के परिवार से जुड़े सदस्यों की चुनावी दावेदारी ने परिवारवाद की बहस को स्थानीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। जब किसी प्रभावशाली नेता के परिवार के एक से अधिक सदस्य चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या पार्टी के दूसरे कार्यकर्ताओं को भी उतना ही महत्व मिला है?
वर्षों तक पार्टी के लिए काम करने वाला कार्यकर्ता बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करता है, चुनाव प्रचार में जुटता है और जनता के बीच पार्टी का आधार बढ़ाता है। उसकी भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं होती हैं। वह भी उम्मीद करता है कि उसकी मेहनत और जनसमर्थन के आधार पर उसे चुनाव लड़ने का अवसर मिलेगा।
लेकिन यदि टिकट वितरण में बड़े नेताओं के परिवारों को प्राथमिकता मिलती दिखाई देती है, तो सामान्य कार्यकर्ताओं के मन में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। उन्हें यह सवाल परेशान कर सकता है कि पार्टी में आगे बढ़ने के लिए मेहनत जरूरी है या किसी बड़े राजनीतिक परिवार से संबंध होना ज्यादा फायदेमंद है?
बीजेपी को इस सवाल का जवाब देना चाहिए। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि सभी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का अधिकार है। असली सवाल यह है कि पार्टी के भीतर टिकट वितरण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और क्या हर योग्य कार्यकर्ता को समान अवसर मिल रहा है?
राजेंद्र राठौड़ के परिवार पर चर्चा, बीजेपी की परीक्षा
राजस्थान की राजनीति में राजेंद्र राठौड़ एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनके बेटे और बहू को टिकट दिए जाने के मुद्दे पर उठने वाले सवाल भी बीजेपी की परिवारवाद विरोधी राजनीति की परीक्षा लेते हैं।
राजनीतिक दलों को यह अधिकार है कि वे अपने उम्मीदवारों का चयन करें। लेकिन जब कोई पार्टी परिवारवाद को विपक्ष की सबसे बड़ी खामी बताती है, तब उसके अपने फैसलों का मूल्यांकन भी उसी नजरिए से किया जाना चाहिए।
यदि किसी नेता के परिवार के सदस्य को टिकट दिया जाता है, तो पार्टी को यह स्पष्ट करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि उम्मीदवार का चयन किन आधारों पर हुआ। क्या उम्मीदवार की अपनी राजनीतिक पहचान है? क्या उसने संगठन में काम किया है? क्या उसे स्थानीय जनता का समर्थन हासिल है? क्या दूसरे दावेदारों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का अवसर मिला?
इन सवालों का जवाब किसी भी पार्टी की विश्वसनीयता को मजबूत कर सकता है। लेकिन अगर पार्टी विपक्ष के लिए अलग और अपने नेताओं के परिवारों के लिए अलग मापदंड अपनाती है, तो उसकी आलोचना होना तय है।
परिवारवाद पर बीजेपी और कांग्रेस के दोहरे मापदंड?
परिवारवाद की बहस में सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है, जब राजनीतिक दल एक ही तरह की स्थिति का मूल्यांकन अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से करने लगते हैं।
कांग्रेस में किसी नेता के बेटे या बेटी को टिकट मिलता है, तो बीजेपी उसे परिवारवाद का उदाहरण बताती है। लेकिन जब बीजेपी में किसी बड़े नेता के परिजन को राजनीतिक अवसर मिलता है, तो उसी स्थिति को योग्यता, जनसमर्थन या लोकतांत्रिक अधिकार का नाम दिया जा सकता है।
सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक सिद्धांत राजनीतिक दलों की सुविधा के अनुसार बदलने चाहिए?
अगर किसी उम्मीदवार को उसकी योग्यता और जनसमर्थन के आधार पर टिकट मिलता है, तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन अगर किसी उम्मीदवार को केवल इसलिए दूसरों पर बढ़त मिलती है क्योंकि वह किसी बड़े नेता का रिश्तेदार है, तो यह राजनीतिक अवसरों की समानता पर सवाल खड़ा करता है।
परिवारवाद का विरोध किसी एक पार्टी के खिलाफ इस्तेमाल होने वाला राजनीतिक नारा नहीं होना चाहिए। यह ऐसी व्यवस्था के खिलाफ आवाज होनी चाहिए, जिसमें सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए अवसर सीमित हो जाएं और प्रभावशाली परिवारों का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ता जाए।
कार्यकर्ताओं की मेहनत का क्या होगा?
किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसके कार्यकर्ता होते हैं। चुनाव के दौरान यही कार्यकर्ता घर-घर जाकर प्रचार करते हैं, लोगों को पार्टी से जोड़ते हैं और संगठन को मजबूत बनाने के लिए मेहनत करते हैं। कई कार्यकर्ता वर्षों तक बिना किसी बड़े पद या राजनीतिक लाभ की उम्मीद के पार्टी के लिए काम करते रहते हैं।
ऐसे में जब टिकट वितरण की चर्चा बड़े नेताओं के परिवारों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है, तो कार्यकर्ताओं के योगदान पर सवाल उठना लाजिमी है।
बीजेपी यदि वास्तव में कार्यकर्ता आधारित राजनीति में विश्वास करती है, तो उसे अपने फैसलों से यह साबित करना चाहिए। पार्टी को ऐसे कार्यकर्ताओं को भी आगे लाना चाहिए, जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक विरासत के अपनी पहचान बनाई है और जनता के बीच भरोसा हासिल किया है।
राजनीति में परिवार से जुड़े लोगों को अवसर मिलने पर आपत्ति नहीं, बल्कि अवसरों के असमान वितरण पर सवाल होना चाहिए। यही अंतर समझना जरूरी है।
जनता सब देख रही है
आज का मतदाता राजनीतिक दलों के बयानों और उनके व्यवहार के बीच का अंतर समझता है। केवल कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाकर बीजेपी इस बहस से बच नहीं सकती। अगर पार्टी परिवारवाद के खिलाफ है, तो उसके सिद्धांत उसके अपने निर्णयों में भी दिखाई देने चाहिए।
कांग्रेस को भी अपने संगठन में पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करने चाहिए। लेकिन कांग्रेस की कमियों को गिनाने से बीजेपी के फैसले सवालों से मुक्त नहीं हो जाते। लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल की जवाबदेही जनता के प्रति है।
आखिर सवाल सीधा है – कांग्रेस में परिवारवाद गलत है, तो बीजेपी में वही व्यवस्था सही कैसे हो सकती है?
झाबर सिंह खर्रा के परिवार की चुनावी दावेदारी और राजेंद्र राठौड़ के बेटे-बहू को टिकट दिए जाने के मुद्दे पर उठती बहस बीजेपी के लिए आत्ममंथन का अवसर है। पार्टी को यह बताना चाहिए कि उसके टिकट वितरण में कार्यकर्ताओं की मेहनत, उम्मीदवारों की योग्यता और जनता के समर्थन को कितनी प्राथमिकता दी जाती है।
किसी नेता का रिश्तेदार होना अपराध नहीं है, लेकिन राजनीतिक विरासत को विशेषाधिकार में बदल देना लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। टिकट वितरण का आधार योग्यता, जनसमर्थन, संगठनात्मक योगदान और जीतने की क्षमता होना चाहिए।
क्योंकि जनता बेवकूफ नहीं है। वह केवल भाषण नहीं सुनती, नेताओं के फैसले भी देखती है। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाली बीजेपी को भी उसी कसौटी पर खरा उतरना होगा, जिस कसौटी पर वह विपक्ष को परखती है। लोकतंत्र में कोई भी पार्टी सवालों से ऊपर नहीं है—न कांग्रेस, न बीजेपी।







