दीपों के महापर्व दिवाली और मां काली की आराधना के पावन पर्व ‘काली पूजा’ को लेकर असम की राजधानी गुवाहाटी में उत्सव की तैयारियां अपने चरम पर हैं। पूरे शहर में विभिन्न पूजा समितियों द्वारा भव्य, आकर्षक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध थीम पर आधारित पूजा पंडाल तैयार किए जा रहे हैं। भव्य लाइटिंग, पारंपरिक बांस की बेजोड़ नक्काशी और स्थानीय लोक-संस्कृति के जीवंत प्रदर्शन के साथ कारीगर और आयोजक पंडालों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।
‘कलर ऑफ सॉयल’: असम चाय, अहोम राजवंश का रंग घर और एक सींग वाला गैंडा
इस वर्ष गुवाहाटी के आयोजनों में सबसे बड़ा आकर्षण कालापहाड़, कॉलोनी बाजार स्थित विवेकानंद स्पोर्टिंग क्लब का पंडाल बना हुआ है। क्लब ने इस बार अपने पूजा पंडाल को “कलर ऑफ सॉयल – टी, बैम्बू एंड रंग घर” (माटी का रंग – चाय, बांस और रंग घर) की अनूठी थीम पर सजाया है। इस पंडाल का मुख्य उद्देश्य असम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को दुनिया के सामने प्रदर्शित करना है।
पंडाल में असम चाय (Assam Tea) के गौरवशाली 200 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक द्विशताब्दी वर्ष का उत्सव मनाया जा रहा है। इसके साथ ही,अहोम राजवंश की वास्तुकला के प्रतीक ऐतिहासिक ‘रंग घर’ और काजीरंगा के विश्वप्रसिद्ध एक सींग वाले गैंडे (One-Horned Rhinoceros) की विशाल कलाकृतियां स्थापित की गई हैं।
1500 बांसों से गढ़ा गया पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा पंडाल
विवेकानंद स्पोर्टिंग क्लब के पदाधिकारी शशांक चक्रवर्ती ने बताया कि उनकी समिति इस वर्ष काली पूजा उत्सव का 62वां वर्ष मना रही है। उन्होंने कहा, “असम की चाय ने अपने उत्पादन और परंपरा के 200 साल पूरे कर लिए हैं। इसीलिए हमने इस बार असम टी को मुख्य थीम के रूप में चुना है। इस पूरे पंडाल के ढांचे के निर्माण में लगभग 1,500 बांसों का उपयोग किया गया है। चाय बागानों की झलक और अहोम काल के ऐतिहासिक रंग घर के साथ हमने असम की पहचान एक सींग वाले गैंडे को भी विशेष रूप से उभारा है।”
चक्रवर्ती ने दावा किया कि उनके क्लब का यह आयोजन पूरे पूर्वोत्तर (नॉर्थ ईस्ट) का सबसे बड़ा काली पूजा समारोह है, जहां हर साल देवी दर्शन के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।
दीपोत्सव और धनतेरस का महत्व
गुवाहाटी समेत पूरे देश में पांच दिवसीय दीपोत्सव की शुरुआत धनतेरस (धन त्रयोदशी) के साथ होती है। इस पावन दिन पर सोना, चांदी, वाहन, बर्तन और अन्य नई वस्तुओं की खरीदारी को सुख, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। वहीं, मुख्य दीपोत्सव 14 वर्ष के वनवास और लंकापति रावण पर विजय के उपरांत भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या आगमन की स्मृति में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।







