हर कुछ दशकों बाद पुरानी पीढ़ी एक ही राग अलापती है—आज के युवा सब कुछ बर्बाद कर रहे हैं। सदियों पहले सुकरात ने भी युवाओं के बदलते तौर-तरीकों और अनुशासनहीनता पर चिंता जताई थी। 1960 के दशक में ‘बेबी बूमर्स’ को आलसी और दिशाहीन कहा गया। इसके बाद ‘मिलेनियल्स’ पर हर स्थापित उद्योग और परंपरा को खत्म करने का आरोप लगा। आज यह ठीकरा ‘जेनरेशन ज़ी’ (Gen Z)—यानी 1990 के दशक के उत्तरार्ध से 2010 के शुरुआती दौर के बीच जन्मे युवाओं—के सिर फोड़ा जा रहा है।
न्यूज़ चैनलों की बहसों, कॉर्पोरेट सम्मेलनों और आम चर्चाओं में जेन ज़ी पर गंभीर आरोप लगते हैं। उन पर कार्यस्थल की उत्पादकता घटाने, अत्यधिक संवेदनशीलता दिखाने, पारंपरिक पारिवारिक संरचना को छोड़ने और डिजिटल दुनिया में खोए रहने का आरोप है। आलोचकों की नज़र में यह पीढ़ी देश की स्थिरता और आर्थिक प्रगति के लिए खतरा बन चुकी है।
लेकिन इस शोर के पीछे एक सीधा सवाल खड़ा होता है: क्या जेन ज़ी सचमुच देश को बर्बाद कर रही है, या यह केवल उन व्यवस्थाओं को ढहा रही है जो अंदर से पहले ही सड़ चुकी थीं?
आरोप: कामचोरी, अति-संवेदनशीलता और सामाजिक बिखराव
जेन ज़ी के खिलाफ मुख्य आरोप तीन मोर्चों पर लगाए जाते हैं: कार्यक्षेत्र, वैचारिक संवाद और सामाजिक व्यवस्था।
पहला आरोप आर्थिक और कार्यसंस्कृति से जुड़ा है। कंपनियों और नियोक्ताओं का कहना है कि युवा कर्मचारी अब कठिन परिश्रम से कतराते हैं। ‘क्वाइट क्विटिंग’ (केवल उतना ही काम करना जितने के पैसे मिलें), बिना वेतन ओवरटाइम से इनकार, और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लगातार छुट्टियों की मांग को वरिष्ठ पीढ़ी कामचोरी मानती है। जिन पीढ़ियों ने 12-14 घंटे काम करने को निष्ठा का पैमाना माना, उनके लिए काम और जीवन के संतुलन (Work-Life Balance) की यह मांग अनुशासनहीनता नज़र आती है।
दूसरा आरोप वैचारिक अति-संवेदनशीलता का है। कॉलेज परिसरों और सोशल मीडिया पर किसी भी असहमत राय को तुरंत नकार देने, बात-बात पर आहत होने और भाषा पर सख्त पहरेदारी (‘कैंसल कल्चर’) का ज़िम्मेदार इस पीढ़ी को माना जाता है। आलोचकों का तर्क है कि जब कोई पीढ़ी किसी भी विपरीत विचार को व्यक्तिगत आघात मान लेगी, तो लोकतंत्र में संवाद और समझौते की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।
तीसरा आरोप सामाजिक संस्थाओं से दूरी का है। विवाह की घटती दर, बच्चों को जन्म देने में अनिच्छा और धार्मिक या सामाजिक आयोजनों से अलगाव को पारंपरिक ढांचे पर हमले की तरह देखा जाता है। आलोचकों का मानना है कि वास्तविक रिश्तों की जगह एल्गोरिदम और सोशल मीडिया ने ले ली है।
ज़मीनी हकीकत: एक टूटी हुई विरासत का बोझ
ये आलोचनाएं सामाजिक बदलाव को तो दर्ज करती हैं, लेकिन असलियत को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। जेन ज़ी ने इस दुनिया के नियम खुद नहीं बनाए; वे तो उन नियमों के टूटने के बाद पैदा हुए हैं।
आर्थिक मोर्चे पर जिसे कामचोरी कहा जा रहा है, वह दरअसल एक व्यावहारिक प्रतिक्रिया है। जेन ज़ी ऐसे समय में वयस्क हुई जब महंगाई चरम पर है,उच्च शिक्षा का खर्च असहनीय हो चुका है और मकानों की कीमतें आम आमदनी से कई गुना आगे निकल चुकी हैं। पुरानी पीढ़ी का वह सामाजिक अनुबंध—कंपनी के प्रति वफादार रहो, दिन-रात एक करो और अंत में एक सुरक्षित जीवन पाओ—जेन ज़ी के करियर शुरू करने से बहुत पहले ही दम तोड़ चुका था। जब वफादारी के बदले छंटनी और स्थिर वेतन मिले, तो युवा पीढ़ी द्वारा केवल तय काम करना स्वाभाविक है, इसे पतन नहीं कहा जा सकता।
पारंपरिक राष्ट्रवाद और संस्थाओं के प्रति उनका संशय भी बेवजह नहीं है। जलवायु संकट, वैश्विक महामारियां और राजनैतिक भ्रष्टाचार को करीब से देखकर बड़ी हुई यह पीढ़ी खोखले नारों के बजाय ठोस जवाबदेही मांगती है। वे व्यवस्था के प्रतीकों की पूजा करने के बजाय यह परखते हैं कि वह व्यवस्था आम इंसान और पर्यावरण के साथ कितना न्याय कर रही है।
तकनीक की प्रयोगशाला में पले बच्चे
जेन ज़ी के मानसिक तनाव, बेचैनी और अलगाव की एक बड़ी वजह वह तकनीक है जिसे पिछली पीढ़ियों ने मुनाफे के लिए खड़ा किया। जेन ज़ी इतिहास की पहली ऐसी पीढ़ी है जिसके हाथ में सोचने-समझने की उम्र से पहले ही स्मार्टफोन थमा दिए गए। उन्हें ऐसे डिजिटल तंत्र में झोंक दिया गया जिसका पूरा मॉडल ही युवाओं की असुरक्षा और आक्रोश को भुनाकर ध्यान आकर्षित करना था। इस डिजिटल चक्रव्यूह को बनाने वाले वयस्कों को छोड़कर, इसके शिकार युवाओं को दोषी ठहराना सरासर अनुचित है।
विनाश या पुनर्गठन?
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई स्थापित व्यवस्था बदलती है, तो उस व्यवस्था के मठाधीशों को यह देश का विनाश ही लगता है। जो पीढ़ी दमघोंटू काम के घंटों, पर्यावरण के विनाश और पुरानी गैर-बराबरी को स्वीकार करने से मना कर दे, उस पर विद्रोह का लेबल लगना तय है।
जेन ज़ी देश को नष्ट नहीं कर रही है। वह केवल उन भ्रमों को जिंदा रखने से इनकार कर रही है जिनकी मियाद खत्म हो चुकी है। पुरानी गलतियों को ढोने से मना करना, शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना किसी राष्ट्र की बर्बादी नहीं, बल्कि उसकी नई बुनियाद रखने की शुरुआत है। जो पेड़ अंदर से सूख चुका हो, उसकी सड़ी हुई टहनियों का गिरना विनाश नहीं, नई कोपलों के लिए रास्ता साफ करना है।







