एक ही खेत से अन्न और बिजली: ‘एग्रीवोल्टाइक’ तकनीक ने बदला खेती का मॉडल, किसानों को मिलने लगी दोहरी कमाई

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देश के कृषि और ऊर्जा क्षेत्र में एक नया तालमेल देखने को मिल रहा है, जिसने जमीन की सीमित उपलब्धता और किसानों की आय से जुड़ी चुनौतियों का एक स्थायी समाधान पेश किया है। ‘एग्रीवोल्टाइक’ (Agrivoltaics)—यानी एक ही भूमि पर एक साथ फसल उत्पादन और सौर ऊर्जा उत्पादन – ने भारतीय कृषि परिदृश्य में नई ऊर्जा भर दी है। हाल ही में भारत द्वारा ‘एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2026’ की मेजबानी किए जाने के बाद यह मॉडल नीतिगत और जमीनी दोनों स्तरों पर चर्चा के केंद्र में आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक रूप से केवल मौसम और बाजार भावों पर निर्भर रहने वाले किसानों के लिए यह तकनीक एक सुरक्षित, नियमित और अतिरिक्त आय का स्रोत बन रही है।

फसल की सुरक्षा के साथ हरित ऊर्जा: कैसे काम करता है यह दोहरा मॉडल

एग्रीवोल्टाइक प्रणाली के तहत खेतों में सौर पैनलों को पारंपरिक सौर संयंत्रों की तुलना में अधिक ऊंचाई पर और निश्चित अंतराल पर स्थापित किया जाता है। पैनलों के बीच पर्याप्त जगह होने से नीचे ट्रैक्टर और जुताई की मशीनें आसानी से चल सकती हैं। सोलर पैनल्स की छांव से सीधे पड़ने वाली भीषण धूप और अत्यधिक वाष्पीकरण रुकता है, जिससे फसलों की सिंचाई के लिए पानी की खपत 20 से 30 प्रतिशत तक घट जाती है। वहीं दूसरी ओर, पौधों से होने वाले वाष्पोत्सर्जन (ट्रांसपिरेशन) के कारण पैनलों के नीचे का तापमान कम रहता है, जिससे सोलर पैनल्स की कार्यक्षमता और बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है। विशेष रूप से पत्तेदार सब्जियां, दलहन, औषधीय पौधे और बागवानी फसलें इस आंशिक छायादार वातावरण में बेहतर पैदावार दे रही हैं।

पीएम-कुसुम के अगले चरण से मिलेगा बढ़ावा, ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ेगी व्यवस्था

सरकार अब इस मॉडल को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने के लिए प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM) के अगले चरण को एग्रीवोल्टाइक से जोड़ने की तैयारी में है। इसके तहत मंडियों, कोल्ड स्टोरेज और ग्रामीण गोदामों के निकट स्थित कृषि भूमि को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे उत्पादित सौर ऊर्जा को सीधे स्थानीय ग्रिड या कृषि अवसंरचना को आपूर्ति किया जा सके। विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs) के साथ बिजली खरीद समझौते (PPA) के माध्यम से किसानों द्वारा अतिरिक्त बिजली सीधे ग्रिड को बेची जा सकेगी, जिससे खेती के साथ-साथ हर महीने बैंक खाते में तय आमदनी सुनिश्चित होगी।

छोटे और सीमांत किसानों के लिए व्यावहारिक डिजाइन पर जोर

भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश किसानों के पास छोटी जोत है, इस तकनीक को व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए लागत प्रभावी और हल्के ढांचों (माउंटिंग स्ट्रक्चर) का विकास किया जा रहा है। कृषि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, जब बेमौसम बारिश या सूखा फसलों को नुकसान पहुंचाता है, तब सौर ऊर्जा से होने वाली मासिक आय किसानों के लिए एक वित्तीय ढाल का काम करती है। खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के इस संतुलित एकीकरण को न केवल भारत में बल्कि पूरे विकासशील विश्व में टिकाऊ कृषि का भविष्य माना जा रहा है।

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